कुछ मेरे भीतर था जिंदा जो बचपन जैसा था एक रात ऐसा डर आया खुद से लड़ना छोड़ दिया है हाँ! मैंने कविता पढ़ना छोड़ दिया है सपनों की सच्चाई देखी देखा टूटें अरमानों को प्रतिभा के माथे चढ़ चढ़ कर मन का मढ़ना छोड़ दिया है हाँ! मैंने कविता पढ़ना छोड़ दिया है छोड़ सके तो, छोड़ मैं देता कागज कलम सिहाई को लत अपनी ये तोड़ न पाया भाव मैं गढ़ना छोड़ न पाया पर हाँ! मैंने कविता पढ़ना छोड़ दिया है # Sainiऊवाच
वो पूछते है कविताओं में क्या है पैसे है ईनाम है या नाम है बहुत रोटी मिलेगी घर चलेगा चूल्हा जलेगा भूख मिटाएगी कविता या प्यास बूझाएगी कविता प्रेयसी के लिए तोहफे मे क्या लाएगी कविता मैं मानता हूँ ये रोटी, दाल नहीं देगी तन पे कपड़ा पसीना पोछने को रुमाल नहीं देगी वैसे तो मैं भी कमा लेता हूँ चार पैसे दौड़ता हूँ खटता हूँ धूल खाता हूँ बरसात भीगता हूँ दुनिया समझती है मशीन मुझे सुबह मशीन बन पेट की खातिर ईंधन जुटाता हूँ रात कविता करता हूँ इंसान हो जाता हूँ जैसे तन के लिए रोटी सुविधा है मन के लिए कविता है : शशिप्रकाश सैनी //मेरा पहला काव्य संग्रह सामर्थ्य यहाँ Free ebook में उपलब्ध Click Here //
ननिहाल है किस हाल है किसको बताए हम पीपल उखड़ गया पत्ते झड़ गए कहाँ यादे बसाए हम कौन रहता साथ हरदम रिश्तों की गिनती है कम कम वक्त के आगे सभी सब हार जाते हैं हैं यहां किसको पता किस पार जाते हैं घर भी अपना घर नहीं है सब यहाँ ईंटे गिराते हैं बाप ने जो घर बनाया वहीं दीवारें उठाते हैं पुश्तों की धरती पे हम ऐसे बिखर गए लोग कैसे क्या हुए रिश्ते ही मर गए आम को जड़ से उखाड़ अमरूद को हिस्सों में डाला बट गई बचपन की यारी बट गई यादें हैं सारी मतलब के रिश्तों के आगे दिन बदल गए काम जब सारा निकल गया तो दिल बदल गए @kavishashi26
...bahut hi sundar Shashi!
ReplyDeleteधन्यवाद अमित जी
DeleteKhoob, Shashi
ReplyDeleteVery nice Shashi Jee.:-)
ReplyDeleteधन्यवाद नागिनी जी
DeleteWaah ! bahut sundar..
ReplyDeleteधन्यवाद इंदु जी
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