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ज़िन्दगी हर मोड़ पे इम्तेहान रही

भीड़ लोगो की लगी  कभी बियाबान रही ज़िन्दगी हर मोड़ पे इम्तेहान रही कभी भोर की हवाओ में  कभी रात का तूफान रही  ज़िन्दगी हर मोड़ पे इम्तेहान रही  दुश्मन करे दोस्त करे  पर सीने पे वार करे  खंजर पीठ पे  बुज़दिली की पहचान रही  ज़िन्दगी हर मोड़ पे इम्तेहान रही  : शशिप्रकाश सैनी  //मेरा पहला काव्य संग्रह सामर्थ्य यहाँ Free ebook में उपलब्ध  Click Here //

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दिल की postioning और प्यार का segmentation सालो पहले टूटा था दिल उसका है ये frustration इश्क कारोबार है यहाँ लगता है business to business relation तब से हमने छोड़ दी straight rebuy की policy न हीर है न कोई राँझा हर चेहरे पे mask है ज़िंदगी रोज एक new task है : शशिप्रकाश सैनी

जब भी आया आड़े आया

हाथों की लकीरों से खेल रहा माथे से भी किस्मत जिसको कहते हो  जब भी आया आड़े आया  न दफ्न अरमा न दफ्न सांसे  न दफ्न मुझको ही कर पाया  : शशिप्रकाश सैनी 

किस्मत है खफा

किस्मत है खफा  क्या मेरी खता जख्मो के सिवा  कुछ  भी  न मिला पत्थर कर दिया  दिल जो था मेरा  सपने न कोई  न इच्छा कोई माटी  है  माटी  है  माटी  है अरमा  माटी  कर चला  : शशिप्रकाश सैनी

मैं कवि हूँ बस कविता करता हूँ

भावनाओं को शब्दों में  पिरोता हूँ आपकी हर आह वाह  पे  जीता   हूँ   मरता  हूँ  तालियों में जान है बसी और सन्नाटे से डरता   हूँ  मैं  कवि हूँ   बस कविता करता   हूँ : शशिप्रकाश सैनी

कम कहूँगा ज़्यादा समझिए

कम कहूँगा ज़्यादा समझिए अरमा टूटे है मै भरा बैठा हू इनदिनों हमसे न उलझिए कम कहूँगा ज़्यादा समझिए कविता मरहम है शायरी है दवा इस दिल-ए-बीमार को खुदा की दुआ कम कहूँगा ज़्यादा समझिए ज़िंदगी जीने को सबको चाहिये वजह कविता मेरी जीने की वहज कम कहूँगा ज़्यादा समझिए : शशिप्रकाश सैनी

लहू से तरबतर हैं दुनिया

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लहू से तरबतर हैं दुनिया दिल लगाने पे खंजर हैं दुनिया जब चाहत को चाहना भी हो गुनाह तो जहन्नुम से बदतर हैं दुनिया जात समझती हैं जज़्बात नहीं मोहब्बत के लिए जहर हैं  दुनिया : शशिप्रकाश सैनी

कभी चंचल कभी चतुराई हैं

प्रियतमा मन पे  यू छाई हैं अठखेलियां उसकी दिल में समाई हैं चाल लगे मृग्नी सी कंठो में शहनाई हैं जाने किस जहां से आई हैं कभी चंचल कभी चतुराई हैं खुदा दिखने लगा हैं उसमे दिखने लगी खुदाई हैं उसके साथ ही तो ज़िंदगी जी हैं उससे पहले तो  बस ज़िंदगी बिताई  हैं : शशिप्रकाश सैनी

सीने पर ज़ख्म हैं और वार कई हैं

सीने पर ज़ख्म हैं और वार कई हैं मगर उसके हाथो में कोई हथियार नहीं हैं ज़ुल्म ये किया उसने जो कह दिया उसने यार हैं पर तू प्यार नहीं हैं तब से उसका दीदार नहीं हैं मोहब्बत चीज़ क्या अब खुदा पे भी ऐतबार नहीं हैं : शशिप्रकाश सैनी

तनख्वा लड़ नहीं पाती अब महीने से

तनख्वा लड़ नहीं पाती अब महीने से दाल के दाने लगने लगे हैं नगीने से जहर पीने की हिम्मत जब करू घर की याद रोक देती हैं जहर पीने से जो लुट रही हैं दौलत वो निकली हैं जनता के पसीने से जलेगी भ्रष्टाचार की लंका की अब सबक ली हैं बाबा के अंदाज़-ए-जीने से कोई युवराज न सिखाए पाठ देशभक्ति का लगाए रखते हैं हर वक़्त भारत माँ को सीने से : शशिप्रकाश सैनी

हाथो में कोई हाथ नहीं

हाथो में कोई हाथ नहीं किसी भी सूरत पे लुटाता नहीं हू दिल अब उभरते कोई जज़्बात नहीं मन को बहका सके आते वो ख़यालात नहीं जाने क्या हो गया हूँ मै या तो पत्थर हो गया हूँ  या कोई देवता हूँ मै : शशिप्रकाश सैनी

हम समझदारी की चादर में लिपटे रहे

हम समझदारी की चादर में लिपटे रहे हम ने कोई बेवकूफी न की बस दिमाग की सुनी दिल की न सुनी देने वाले ने इतनी अक्ल दी कि अब तक की ज़िन्दगी अकेले है जी जब किसी ने विस्मित किया भरमाया किसी पे दिल आया अपने जज्बातों पे डाल दी मिट्टी इतनी हमे अक्ल क्यों दी कवि होने की ये व्यथा रही बात जो जुबाँ की थी हमने कागजों पे उकरे दी इश्क बेवकूफों की सौगात थी उसने हमे थोड़ी भी बेवकूफी न दी : शशिप्रकाश सैनी

खोने के लिए

खोने के लिए उसको पाना ज़रुरी था दिल से उसका हो जाना ज़रुरी था जिसे पाया ही नहीं उसे खोऊ कैसे आँखों बहे आसू क्यों और मै रोऊ कैसे :शशिप्रकाश सैनी

इस तरह जिंदगी बिताई हैं

उसने दी हैं और हमने लुटाई हैं जिंदगी कुछ इस तरह से मुस्कुराई हैं बारिसे ऐसी बरसाई हैं धुप खिड़कियों से यूँ छन के आई हैं यूँ लगता सीने में खुदा हैं मेरे हाथो में खुदाई हैं जो दोनों हाथो लुटाई हैं  इस तरह जिंदगी बिताई हैं : शशिप्रकाश सैनी

ये नहीं मालूम क्या होगा उसके जाने के बाद

ये नहीं मालूम  क्या होगा उसके जाने के बाद पर ज़िन्दगी ज़िन्दगी हो गयी थी  उसके आने के बाद आइने घर के हमारे मुस्कुराने लगे की हम भी अब इंसा नज़र आने लगे जाने क्या हो गया था  हमको प्यार हो जाने के बाद : शशिप्रकाश सैनी