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ना से डरना क्या

मेरे इजहार पे तू शरमाई नहीं मै अस्मा हो के भी झुका  तू जमी हो के भी आई नहीं  वो समझी हम टूटेंगे बिखर  जाएंगे  फकीर की मानिन्द दर-दर जाएंगे  एक ना से डर जाऊ बिखर जाऊ  मुझमे इतनी नासमझी नहीं  तुने ना दी है  ठुकराया है मुझे  तो कही किसी के होठो में हां होगी रात घनी है तो जल्द ही सुबह होगी मेरे इजहार पे उसे शर्माना है  लबो को हौले से हिलाना है  की उसको हां हो जाना है  :शशिप्रकाश सैनी You might also like: ना का डर हां से हल्का है मिल जाए कोई कवयित्री खाली पन्नें

खाली पन्नें

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This post has been published by me as a part of the Blog-a-Ton 28 ; the 28th Edition of the online marathon of Bloggers; where we decide and we write. To be part of the next edition, visit and start following Blog-a-Ton . The topic for this month is 'BLANK PAGES'. खाली पन्नें किस्मत ने छोड़े कुछ सवाली पन्नें जिंदगी के खाली पन्नें वैसे तो मेरी कहानी से पूरी किताब भरी है लडकपन है जवानी है नादान है सयानीं है मेरी पूरी कहानी है धुंधली है सुनहरी है पूरी किताब भरी है इश्क पे रखा यकीन पर बरसीं नहीं बरसात बन के रह गया दिल का खालीपन कोई आई नहीं सौगात बन के   किस्मत ने छोड़े कुछ सवाली पन्नें दिल्लगी के खाली पन्नें रीश्ता दे फरिश्ता नहीं इंसान ही दे मोहब्बत दे भले थोड़ी नादान ही दे जिंदगी महका सकें वो खुशबू दे दिल धड़कता रहे कोई आरजू दे कब तक ख्यालों से भरे दिल्लगी के खाली पन्नें नाराज़गी दे मनाना दे ऐसा कोई तराना दे धड़कने को बहाना दे कब तक करेंगे सवाल ये सवाली पन्ने अकेलापन खटकता है दिखे ...

मै मील का पत्थर

ऐ ज़िंदगी थोड़ा चान्स दे करने को हमे भी थोड़ा रोमांस दे  मोहब्बत  ख्यालों कविताओ से निकले  कोई दिल हम पे भी पिघले  मै चलता कोई चाल नहीं आँखों को भरमाए  मुझे में ऐसा कोई कमाल नहीं बस दिल है दिल में जज़्बात है  एक ही चाहू हज़ार नहीं मेरे यही ख्यालात है  प्यार में इसलिए पिछड़ा हू क्योकि इन दिनों  आँखों को जो भरमाए वही भाए बड़ा हू बेहतर हू  पता नहीं  पर मै मील का पत्थर हू जहाँ गडोगी वही रह जाएगा  सुन्दर है चमकदार है  जो आपकी नज़रों में हीरे है  जान लीजिए हीरे कीमत पे बिकते जो बड़ी बोली लगाएगा  साथ ले जाएगा  बाज़ार मंडियों की शान है हीरा बिकता है बिक जाएगा  हीरा पहनने में क्या मान है मै मील का पत्थर हू जहाँ गडोगी वही रह जाएगा  हीरा बिकता है बिक जाएगा  : शशिप्रकाश सैनी

नाता तोडना गुनाह नहीं

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Photo courtesy: Saishyam and Arun Photography साथी सफर के जब हमसफ़र ना हो पाए जब रहे हम हमराह नहीं रास्ता बचा कोई दूसरा नहीं नाता तोडना गुनाह नहीं जब मालूम ये पड़ जाए रिश्ता रहेगा पत्थर होगा देवता नहीं नाता तोडना गुनाह नहीं इंसान गलतियों का पुतला है कुछ तुमसे हुई कुछ हमने की जब और पटरी ना खाए दुनिया के लिए क्यों तमाशा हो जाए साथ तो छोडो पर दिल न तोड़ो दिल को करो ना बर्बाद दिल मिलेगा हमराही रहे इतना आबाद दिल गाठे खोलो ऐसे की कल को नज़र मिला पाए दोस्त रहे दुश्मन न होजाए ये ज़िंदगी के हिस्से है मिटा ना पाओगे किसी राह में टकराओगे मुस्कुराना मुश्किल ना होजाए उसे आसान रहने दो हाथ मिला पाए इतना मान रहने दो ऐ अतीत मेरे हम हमराही ना होपाए हमसफ़र ना होपाए तुम भी रहो इन्सान  हमे भी इन्सान रहने दो  ज़िंदगी आसान रहने दो :शशिप्रकाश सैनी

साल 1998

पहली बार छेड़ा था तार दिल का एक नज़र में ले गयी करार दिल का, दिल के सफ़र की सुहानी घड़ी थी इलाहाबाद चढ़ी थी सतना उतरी थी, पुरे सफर  में उसकी नज़र पे नज़र टिकी थी, 6 घंटे का सफ़र था पर यादो में सालो बसी थी, वो मेरी बचपन की दिल्लगी थी न नाम मालूम, न पते का पता मासूम था दिल उसकी आँखों में भी मासूमियत भरी थी,  तस्वीर धुंधली से हो गयी ओझल प्रेम था या आकर्षण जो भी था, था निश्छल :शशिप्रकाश सैनी //मेरा पहला काव्य संग्रह सामर्थ्य यहाँ Free ebook में उपलब्ध  Click Here //

मानसून दिल का

(ये कविता मैंने  2001  में लिखी थी ) तुम जमकर बरसों ऐसी भी मेरी फरमाईस नहीं है बस दो बूंद प्यार की गिराती जाओ तुने सताया हैं बरसो तक अब तो लम्हे इतंजार घटाती जाओ वह तो भिगोता है तन को रह-रह के बस मन को तुम भिगोती जाओ  मेरे प्यार की तृष्णा बुझाती जाओ सर से पैर तक तरबतर हूँ फिर भी दिल में है कि सूखा पड़ा है याद आती है आंधीयाँ बन कर घिरा हूँ समुन्दर से फिर भी प्यासा हूँ हूँ साहिल पे लकिन डूबता हूँ अब बरसों तब बरसों लेकिन देर न कर धमकियां देने की मेरी आदत नहीं मानसून साल दर साल आता है दुनिया रंग बदलती है लोगो का दिल बदल जाता है : शाशिप्रकाश सैनी

जब भी आया आड़े आया

हाथों की लकीरों से खेल रहा माथे से भी किस्मत जिसको कहते हो  जब भी आया आड़े आया  न दफ्न अरमा न दफ्न सांसे  न दफ्न मुझको ही कर पाया  : शशिप्रकाश सैनी 

किस्मत है खफा

किस्मत है खफा  क्या मेरी खता जख्मो के सिवा  कुछ  भी  न मिला पत्थर कर दिया  दिल जो था मेरा  सपने न कोई  न इच्छा कोई माटी  है  माटी  है  माटी  है अरमा  माटी  कर चला  : शशिप्रकाश सैनी

कम कहूँगा ज़्यादा समझिए

कम कहूँगा ज़्यादा समझिए अरमा टूटे है मै भरा बैठा हू इनदिनों हमसे न उलझिए कम कहूँगा ज़्यादा समझिए कविता मरहम है शायरी है दवा इस दिल-ए-बीमार को खुदा की दुआ कम कहूँगा ज़्यादा समझिए ज़िंदगी जीने को सबको चाहिये वजह कविता मेरी जीने की वहज कम कहूँगा ज़्यादा समझिए : शशिप्रकाश सैनी

ज़िंदगी सुबह थी हम जिधर गए उधर गए तुम

ज़िंदगी सुबह थी हम जिधर गए उधर गए तुम रात होने लगी साथ छोड़ गए अंधरे से डर गए तुम तुम में अरमा थे बसे सासे थी ज़िंदगी तुमसे थी हार बाहों का मोतियों का नहीं फिर क्यों बिखर गए तुम मै मोहब्बत पूजने लगा था इश्क मजहब हो गया था बावाफई का सिला बेवफ़ाई मिला नज़रों से उतर गए तुम जरुरत पडने पे सर झुकाना तेरा आसू मतलबी बहाना तेरा आवाज़ में नरमी नम आँख देख दुनिया समझती सुधर गए तुम जब तुने मुह मोड़ा था “सैनी” ने धड़कना छोड़ा था जब वफ़ा की चिता जली उसके लिए मर गए तुम : शशिप्रकाश सैनी 

मेरा हाल न पूछ

कर के बहाने पास आना नहीं न मेरी सुन अपनी बताना नहीं मेरी जुस्तजू न पूछ मेरा हाल न पूछ तू हक खो चुकी कोई सवाल न पूछ दिल के ख्याल मन के मलाल न पूछ तू हक खो चुकी कोई सवाल न पूछ : शशिप्रकाश सैनी

मिल जाए कोई कवयित्री

इस कवी को मिल जाए कोई कवयित्री ज़िन्दगी हो जाए जैसे कोई पोएट्री  वो करे कविता हम कहे शायरी  बस यू ही भरती जाए जिंदगी की डायरी उनके आने से लय ताल होजाए  जीना भी फिर कमाल होजाए  मै वीर रस वो श्रृंगार रस  प्रेम बढ़े बरस दर बरस  हम हो जाए दोहा तुम हो जाओ ग़ज़ल हम तुम्हे सुने तुम हमें प्रेम हो जाए सफल  हम कहे काफिया तुम जोड़ो रदीफ़ ग़ज़ल हो जाएगी पूरी तुम आओ तो करीब हम बेबहर से हमे बाबहर करो हम कविता कर लेते है  तुम ग़ज़ल करो  कोई कवियत्री कोई शायरा मिले तो बताना  एक कवी दिल टटोलता है  इस आश में कही मिल जाए ठिकाना  : शशिप्रकाश सैनी //मेरा पहला काव्य संग्रह सामर्थ्य यहाँ Free ebook में उपलब्ध  Click Here //

मै अकेला रह नहीं पाता

मैं अकेला रह नहीं पाता तेरे ख्याल आते हैं अंधेरे कमरों में उम्मीद के जुगुनू टिमटिमाते हैं रौशनी चुभने लगी है आँखों में, कोई बुझा दे ये दियें मेरे छुने से लोग पत्थर हो जाते हैं भावनाए नहीं बचती संवदेनाएं मर जाती हैं मेरे छुने से लोग पत्थर हो जाते हैं मैं अभिशाप होने लगा हूँ तुम वरदान ही अच्छी छुओ न मुझे आओ न करीब दुनिया में वरदान बहोत कम अभिशाप बहोत ज्यादा हैं   : शशिप्रकाश सैनी

ऐ खुदा भूलने का हुनर दे की हम उसे भुला दे

ऐ खुदा भूलने का हुनर दे, हम उसे भुला दे बावफाई का सिला बेवफ़ाई, उसकी यादे भी जला दे बेवफाई की दुनिया ये, दिल लगाना हैं गुनाह या खुदा रहम कर बन्दों पे, जीने का हौसला दे जीतनी भी सुन्दर काया, आँखों में सब माया ये इश्क की जादूगरी, अच्छे अच्छो को बरगला दे दिल खेल हैं, आप खिलवाड़, वो खिलाड़ी यारो को भिड़ा दे, बरसों की दोस्ती हिला दे रौंदे है दिल, मिट्टी में अरमा रौंदे है बेवफ़ा को बेवफ़ा मिले ये सिला दे वो बेवफ़ा थी लौट के आनी नहीं “सैनी” मयकदा चल मय की मयकशी में उसे भुला दे : शशिप्रकाश सैनी  //मेरा पहला काव्य संग्रह सामर्थ्य यहाँ Free ebook में उपलब्ध  Click Here //

मै अब बोलने लगा हू

ज़ज्बात अल्फाज़ होने लगे है चुप नहीं रहता बोलने लगा हू दिल-ए-किताब से धुल हटाई है पन्ने दर पन्ने खोलने लगा हू आंखे बोलती है तेवर चुप नहीं रहते इश्क की आग जो बढने लगी है जुबा कम पड़ने लगी है इशारों में गहराई झांक लो आंखे देखो मन भाप लो दिन के चार चक्कर तेरे घर के इधर उधर रास्ता था कहा जाते किधर तेरी गली अब रास्ता होने लगी है चाय की चुस्कियो वाली सुबह यही है रात की चाँदनी भी यही देखनी है पड़ोसी जान गए है तुम भी जान जाओगी की मै अब बोलने लगा हू : शाशिप्रकाश सैनी 

क्या थी नाराज़गी हम समझे नहीं

क्या थी नाराज़गी हम समझे नहीं ना शिकवा ना गीला कुछ बोलिए तो जरा काले चस्मो से छुपाली है आंखे न आँसू दिखे हम अब कैसे मन में झाँकें मिलो बात करो आओ तो सही हमसे सुनो अपनी सुनाओ तो सही पास आने पे पिघल जाएगी रिश्तों की बर्फ हम भी कुछ बढ़े आप भी आए हमारी तरफ मिलते रहिये मुलाकातों का सिलसिला रहे गिले है ज़िंदगी से बहुत आप से क्यों गीला रहे : शशिप्रकाश सैनी

ओ बादल बूंदें बरसाना

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वो ठंडी पवन का झोंका था जो तूने हमको रोका था वो सावन की बरसातें थी सोंधी सोंधी सी बाते थी छोटी मोटी जो अनबन थी बिजली की फिर जो गर्जन थी तेरा बाहों में आजाना नज़रों का जो वो टकराना ओ बादल बूंदें बरसाना इतना अब तू तरसा ना कब मिलना बतला जाना ओ बादल बूंदें बरसाना अब तक यादो में ताज़ी है होठो का जो था टकराना बाहों में आना घुलते जाना अब तक यादे ताज़ी है तेरा आना तेरा जाना आँखों में जो प्यार भरा लफ्जों से कर इज़हार जरा सब कुछ मैंने है बोल दिया तू भी कुछ बतला जाना अब तू इतना तरसा ना या तो आना या तो जाना ओ बादल बूंदें बरसाना : शशिप्रकाश सैनी 

दिल अब तक मेरा बच्चा है

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मन की भी कुछ सोच है कुछ इच्छा है कब तक दिल को समझाऊ  तू अब तक बच्चा है मानी के मनमानी के खेल खेल जवानी के  बुजुर्गो की सुने तो बच्चा है छोटे कहे की  तेरा समय निकल चूका है  मन की भी कुछ इच्छा है दिल को कब तक बहलाऊ  की तू बच्चा है पलंग की सिलवटो में  कोई कहानी नहीं  कभी कोई मानी नहीं  की हम ने कोई मनमानी नहीं पलंग की सिलवटो में  कोई कहानी नहीं  न बोतलों में नशा है न होठो में धुआ है  न कही पैर फिसला है  दिल को कैसे बतलाऊ  दुनिया समझती तू बच्चा है  यही तेरी गलती है  यही तेरा दोष है तू रात के रिश्तो से  ज़िन्दगी का साथ चाहता है  बीके हुए से  जो अपनी कीमत पूछता है यही तेरी गलती है  यही तेरा दोष है ये तो सही है  की दिल अब तक तेरा बच्चा है  कोई तो ऐसी बची होगी  जो दिल की बच्ची होगी  मन की सच्ची होगी  बस उस...

ना का डर हां से हल्का है

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जब तक इज्ज़त की फ़िक्र थी मै बोलता न था कभी हौसला कम था कभी फासला था बहोत कभी आवाज़ की कशिश थी कभी नज़रों में था नशा फिर जो नज़र का असर होने लगा होश मै खोने लगा नशा मोहब्बत का सर पे तारी हो गया हौसला इज्ज़त से भारी हो गया ना का डर हां से हल्का है मोहब्बत जाम है और जाम छलका है फैसले की चाह में हौसला बड़ाया है पिंजरे तोड़ ये परिंदा उड़ने आया है एक हां की ललक में हौसला बड़ाया है एक ना के डर से अब तक खुद को आजमाया ना था सीने में प्यार था दुनिया को दिखाया ना था हां से हासिल होगा ना से फासला होगा होने को वही होगा जो किस्मत में लिखा होगा कलमकार हू कलम चलाता रहूँगा ज़िंदगी की भट्टी पे जज्बात जलाता रहूँगा :शशिप्रकाश सैनी

तेरे साथ की जरुरत हैं

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photo courtesy: Seema Sharma तन की नक्काशी कही धोखा ना दे दे मन से पुकारे की एक आवाज की जरुरत हैं साथ तेरे चलने से जले या ना जले दुनिया पर क़यामत तक चले की तेरे साथ की जरुरत हैं झुर्रियाँ बाल सफ़ेद सब उम्र के फरेब तन न भाया भाया मन दिल में दिखा न ऐब दिल-ए-जज़्बात को तेरे जज़्बात की जरूरत हैं ईट पत्थर से कोई घर न बना हैं पत्थर जड़ा के ताज में कोई सुन्दर न बना हैं अपनों की दुआ मिले तो घर भी बना ले दिल जीत लाए तो सुन्दर भी बना ले आशीर्वाद देता रहे उस हाथ की जरुरत हैं हैं नयी दुनिया पर दस्तूर पुरानी प्रेम सच्चा हो तभी चलती हैं कहानी मै दिल से बात करता तू भी दिल से बात कर न मै किसी से डरता न तू किसी से डर दुनिया नयी होगी पर बात पुरानी प्यार खरा हो तभी बढती हैं कहानी : शशिप्रकाश सैनी  //मेरा पहला काव्य संग्रह सामर्थ्य यहाँ Free ebook में उपलब्ध  Click Here //