ना से डरना क्या
मेरे इजहार पे तू शरमाई नहीं मै अस्मा हो के भी झुका तू जमी हो के भी आई नहीं वो समझी हम टूटेंगे बिखर जाएंगे फकीर की मानिन्द दर-दर जाएंगे एक ना से डर जाऊ बिखर जाऊ मुझमे इतनी नासमझी नहीं तुने ना दी है ठुकराया है मुझे तो कही किसी के होठो में हां होगी रात घनी है तो जल्द ही सुबह होगी मेरे इजहार पे उसे शर्माना है लबो को हौले से हिलाना है की उसको हां हो जाना है :शशिप्रकाश सैनी You might also like: ना का डर हां से हल्का है मिल जाए कोई कवयित्री खाली पन्नें