कर के बहाने पास आना नहीं
न मेरी सुन अपनी बताना नहीं
मेरी जुस्तजू न पूछ
मेरा हाल न पूछ
तू हक खो चुकी कोई सवाल न पूछ
दिल के ख्याल
मन के मलाल न पूछ
तू हक खो चुकी कोई सवाल न पूछ
कुछ मेरे भीतर था जिंदा जो बचपन जैसा था एक रात ऐसा डर आया खुद से लड़ना छोड़ दिया है हाँ! मैंने कविता पढ़ना छोड़ दिया है सपनों की सच्चाई देखी देखा टूटें अरमानों को प्रतिभा के माथे चढ़ चढ़ कर मन का मढ़ना छोड़ दिया है हाँ! मैंने कविता पढ़ना छोड़ दिया है छोड़ सके तो, छोड़ मैं देता कागज कलम सिहाई को लत अपनी ये तोड़ न पाया भाव मैं गढ़ना छोड़ न पाया पर हाँ! मैंने कविता पढ़ना छोड़ दिया है # Sainiऊवाच
मैं बैकबेंचर रहा हूँ और हमेशा रहूँगा ! कितनी ही बार खदेड़ा गया हूँ पहली बेंच पे पर लौट आता हूँ दूर क्लास के कोलाहल से शांति की तलाश में बुद्ध हूँ जैसे एक अश्वमेध चल रहा है मुझमें सोच के घोड़े चारों दिशाओं में दौड़ा रहा हूँ पीछे बैठा हूँ, पर पीछे नहीं हूँ अपनी एक अलग ही दुनिया बना रहा हूँ पीछे बैठा हूँ, पर पीछे नहीं हूँ कभी शोर का संगीत सुन लेता हूँ कभी अपने मन की चुप्पी सारे कोलाहल पे बुन देता हूँ जब तीसरी आँख खोलता हूँ तांडव कागजों पर ऊकेर देता हूँ पीछे बैठा हूँ, पर पीछे नहीं हूँ आज भी ज़िंदगी में थोड़ा सा पीछे बैठता हूँ दुनिया के दाँव पेंच से परे अपनी ही मौज में चहकता हूँ हाँ, मैं बैकबेंचर रहा हूँ ! : शशिप्रकाश सैनी
वो पूछते है कविताओं में क्या है पैसे है ईनाम है या नाम है बहुत रोटी मिलेगी घर चलेगा चूल्हा जलेगा भूख मिटाएगी कविता या प्यास बूझाएगी कविता प्रेयसी के लिए तोहफे मे क्या लाएगी कविता मैं मानता हूँ ये रोटी, दाल नहीं देगी तन पे कपड़ा पसीना पोछने को रुमाल नहीं देगी वैसे तो मैं भी कमा लेता हूँ चार पैसे दौड़ता हूँ खटता हूँ धूल खाता हूँ बरसात भीगता हूँ दुनिया समझती है मशीन मुझे सुबह मशीन बन पेट की खातिर ईंधन जुटाता हूँ रात कविता करता हूँ इंसान हो जाता हूँ जैसे तन के लिए रोटी सुविधा है मन के लिए कविता है : शशिप्रकाश सैनी //मेरा पहला काव्य संग्रह सामर्थ्य यहाँ Free ebook में उपलब्ध Click Here //
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