कुछ मेरे भीतर था जिंदा जो बचपन जैसा था एक रात ऐसा डर आया खुद से लड़ना छोड़ दिया है हाँ! मैंने कविता पढ़ना छोड़ दिया है सपनों की सच्चाई देखी देखा टूटें अरमानों को प्रतिभा के माथे चढ़ चढ़ कर मन का मढ़ना छोड़ दिया है हाँ! मैंने कविता पढ़ना छोड़ दिया है छोड़ सके तो, छोड़ मैं देता कागज कलम सिहाई को लत अपनी ये तोड़ न पाया भाव मैं गढ़ना छोड़ न पाया पर हाँ! मैंने कविता पढ़ना छोड़ दिया है # Sainiऊवाच
This post has been published by me as a part of the Blog-a-Ton 30 ; the thirtieth edition of the online marathon of Bloggers; where we decide and we write. To be part of the next edition, visit and start following Blog-a-Ton . सागर जैसे नाट्यमंच छोड़ जीवन के प्रपंच नयी आश जगाने आजाना तुम शाम बिताने आजाना रेत कैसे महल करे लहर करे उसे रेत कैसे मिट्टी में मिले ख्वाबो की ये रेत जब हार मानी ही नहीं तो अंतिम कोई हार नहीं अभी नहीं बिखरना हैं तुझे जीत में उभरना हैं हर बार वही पहल करे रेत फिर महल करे बच्चो को अपने ये पाठ सिखाने आजाना तुम शाम बिताने आजाना लहरों का महौल चला गाँठ प्रेम की खोल चला सागर मंथन में था अमृत अब तट पे बस्ता प्यार कहीं पुराना, कहीं नया होता हैं सपना साकार कहीं नया जोड़ा हैं बनता कहीं पुरानों में फुके जान मुश्किल जीवन की हलचल को सागर तट करता आसान मन में पुष्प प्रेम, खिलाने आजाना तुम शाम बिताने आजाना दफ्तर सारा बोझ हुआ घुटना देखो रोज हुआ अब थोड़ा तो हल्का हो ले सूरज ...
This post has been published by me as a part of the Blog-a-Ton 40 ; the fortieth edition of the online marathon of Bloggers; where we decide and we write. To be part of the next edition, visit and start following Blog-a-Ton . The theme for the month is "MAKE A WISH" रात स्वप्न में , प्रभु थे खड़े बोले मांगो वत्स क्या मांगते हो जमीं चाहते हो या आसमां चाहते हो बड़ी गाडी , बड़ा घर , नोटों की गट्ठर या सत्ता सुख कुर्सी से हो कर जो चाहो अभी दे दूँ एक नयी ज़िन्दगी दे दूँ मैंने माँगा तो क्या माँगा एक बेंच पुरानीं सी वो पीछे वाली मेरे स्कूल की चाहिए मुझे वो बचपन के ज़माने दोस्त पुराने मदन के डोसे पे टूटना चेतन का वो टिफिन लूटना अपना टिफिन बचाने में टीचर क्लास सभी को भूले हम मस्त थे खाना खाने में मुझे वो होली चाहिए ओ एन जी सी कॉलोनी चाहिए वो ठंडाई वाली ट्रक वो लड़कपन की सनक एक दुसरे का फाड़ते हम कुर्ता अनिल मेरे दोस्त ये वक़्त क्यों नहीं मुड़ता गुरप्रीत के घर वाला रास्ता मेरा टूयूशन मेर...
that is a nice one, really liked it
ReplyDeleteबेहद सुन्दर रचना
ReplyDeleteकम शब्दों में सटीक संवदेना
emotional
ReplyDeleteधन्यवाद चिराग जी
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