दुर्घटना से देर भली





पिघल गए मुस्कान पे पहली
जिसकों सरल भाव थे समझे
वो निकली जी गुढ़ पहेली
वो चक्रव्यूह की व्यूहरचना है
प्राण बहुत मुश्किल बचना है

हाड मॉस को मोम है समझी
आग दे रही भट्टी में
मिट्टी से आकार हुआ हूँ
उसके साँचे में ढालना ना
चाहे मील जाऊ फिर मिट्टी में

रंगरोगन दीवारे रंग दी
पल भर की खुशी ने
दुनिया ही बदल दी
कैंची बन चली रिश्तों पे
कि रिश्तों की डोर काटने लगी
अपने अतीत से मेरा अतीत पाटने लगी

दोस्तों की फेहरिस्त बदल दी गई
कैंची दोस्ती पे भी चली
दुनिया की नज़र में
कहने को उसकी पहचान बदली
नाम मेरा पीछे लगाने लगी
डमरू बजा के बन्दर बनाया है
सरे बाज़ार नचाने लगी

गर बनना चाहते है बंदर नहीं
इशारों पे नाचना नहीं आता है रास
सौ बार सोचे आंखे मले
आज की हूर परी
कल डायन न बन निकले

उसी से बात बढ़ाईए
जो मन जचे
 हुस्न की जादूगरी से बचे
हड़बड़ी में ये रेखा न पार करे
बात बढ़ाए जहाँ प्यार करे

दुनिया की रफ़्तार में ना खोए
भले रहे गाड़ी खड़ी की खड़ी
दुर्घटना से देर भली


: शशिप्रकाश सैनी


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