मेरी हिंदी पखवाड़ो में नहीं बंधी हैं अभी, आजाद हैं


अभी एक मित्र ने कहा भाई तुम तो कवि हो, हिंदी दिवस पे कोई कविता नहीं की, हिंदी को याद करते हुए कुछ लिखो| क्या तुम हिंदी का सम्मान नहीं करते, या बस उपयोग भर का हैं तुम्हारा साथ|


पहली बात तो ये हैं मित्र, याद उसे किया जाता हैं जो दूर हो जिसे खोने का डर बना रहता हो | मुझे से तो ये आँचल छोड़े नहीं छूटता, माँ कोई चीज थोड़ी ही है जी में आया अपना लिया फिर मन उक्ता गया छोड़ दिया|


हिंदी माँ हैं मेरी बस भाषा भर नहीं है, जिसने मुझे बोलना सिखाया, जिसने मुझे शब्दों का सहारा दिया, इतनी हिम्मत दी की मन की गहरी से गहरी बात मै दुनिया के सामने रख सकू बिना संकोच के |
उस हिंदी को मेरी माँ को मै याद करू? जिसकी गोद मैंने कभी छोड़ी ही नहीं उसको याद करू?


जब दुनिया डराती हैं बरगलाती हैं
मैं कस के आंचाल पकड़ लेता हूँ
'सेवासदन' 'रश्मिरथी' 'मधुशाला' उठा पढ़ लेता हूँ
कलम मेरी चलने लगती हैं
कुछ सपने कविताओं में गढ़ लेता हूँ


जिस हिंदी को मैं हर पल जीता हूँ, उसको मैं याद करू ?


याद वो करे जो भूले बैठे हैं, जिन्हें महानगरो में हिंदी बोलने पढने में शर्म आती हैं,
जिन्हें देवनागरी में लिखे जमाना हो गया, अब ये ना पूछियेगा ये देवनागरी क्या हैं फिर तो आपको अच्छी तरह याद करने की जरुरत हैं हिंदी को|


आप करे याद हम तो हिंदी जी रहे है और जियेंगे |
मेरी हिंदी पखवाड़ो में नहीं बंधी हैं अभी, आजाद हैं |


: शशिप्रकाश सैनी


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