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अठाईस की अमीरी

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Photo courtesy: The Hindu योजना अयोग्य की योग्यता देखिए जानता को अठाईस की अमीरी के छलावे है अपने शौक के लिए पैतीस लाख के शौचालय है अठाईस रुपये की अमीरी नहीं जच रही हां मानता हू पहली बार अमीर जो हुए है इतनी आसानी से नहीं पच रही गाड़ी में पेट्रोल नहीं मुह में दाना नहीं मुन्ना मुन्नी की फीस भारी पड़ी पर ऑसू बहाना नहीं सरकार ने आपको अमीर कर दिया है खुद को गरीब बताना नहीं बी पी एल की कम कर दी है लकीर जो अठाईस से कम कमाए वो ही फकीर     बेकार की नाराज़गी फिजूल की  हाय तोबा जो करोडो देश का खायेंगे बिना डकार के पचाएंगे वो ऐसे ही रास्ते पे थोड़ी ना बहाएंगे करोड़ो की गंदगी है मोड़ों पे थोड़े ना शुरू होजाएंगे कम से कम पैतीस लाख का बनवाएंगे शौक से सौचा मिटाएंगे तब जाके बहाएंगे : शशिप्रकाश सैनी 

बीवी लाए हो दासी नहीं

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inspired by Vinisha's Post न नौकर न बावर्ची न कोई सामान लाए हो ध्यान से देखो डोलीं में तुम भी इंसान लाए हो जैसे तुम्हारे सपने है उसकी भी इच्छाएं है पुरुषत्व का ढोल न पीटो टटोलो मन उसका समझदार बनो सिर्फ जिम्मेदारीया ना गिनाओ थोड़ा तुम भी जिम्मेदार बनो दकियानूसी शक्कीमिजाज़ हो जाओगे तो दिल से दूर पाओगे अपने रिश्तों को अहमियत दोगे उसके नातो को खाजाओगे अपने लिए खुशी उसको उदासी बीवी लाए हो या दासी   दीवारों में खिड़कियां रहने दो मंगल जो सूत्र है उसे बेडियां न करो रिश्तों में जगह रहने दो हवा पानी बरसात मिले रात से दूर रखो धूप मिले सुबह रहने दो प्रेम बीज पौधा होजाए कल को फूल दे खुश्बू दे रिश्तों में इतनी समझ रहे एक के आँसू पे दूसरा कैसे पनपे कर्तव्य अधिकार बराबरी के रहे सिर्फ उसे ना झुकाओ खुद भी झुको सिर्फ अपनी न गिनाओ उसकी भी मजबूरियां समझो बंधुआ मजदुर कोई नौकर नहीं है वो जैसे अपने घर के तुम चिराग हो वैसे बड़े नाज़ों से पली है माँ बाप की पलकों पे चली है वो भी अपने घर की परी है ...

इंसान रहने दो, वोटो में न गिनो

न चोरी, न चकारी, न गुंडई में हूँ महेनत, लगन, शिद्दत, इन्हीं आदतों में हूँ न चोरी, न चकारी, न गुंडई में हूँ दिन रुसवाई, रात तनहाई में हूँ दो वक्त की रोटी के लिए बस खटतारहा हूँ और ईनाम में मिली तोहमतें हैं लोग यहाँ, मुझे बुराइयों में गिनते हैं मेरा घर, मेरी टैक्सी, मेरा ठेला, जला देंगे जब जी में आए, थप्पड़ लगा देंगे नोटों की गट्ठर, अगर होती मेरे सर तो नहीं जलता मेरा घर बिकाऊ हैं भीड़, बिकाऊ हैं पत्थर होनी चाहिए बस, नोटों की गट्ठर कहा से लाए नोटों की गट्ठर की अब तक, मैं ईमान में हूँ खाकी, खादी, बिक चुकी हैं इनकी नज़रों में, मैं इंसान नहीं हूँ क्योंकि आज भी ईमान में हूँ जो दो वक्त की रोटी के लिए पीसता हो दिन रात वो बदले में क्या देगा उसका तो घर ही जलेगा बंधू मित्र आना नहीं यहाँ ये स्वप्न नगरी नहीं छलावा हैं मशीन इतना हुए की न सपने हैं न इच्छा हैं कभी कभी भूल जाते हैं की हम भी जिन्दा हैं जब से इस शहर की राजनीति हुआ हूँ मैं सब सहमति से नोचे हैं दुर्गति हुआ  हूँ मैं मुझे मारना भी वोट हैं पुचकारना भी व...

गर्दन को मेरी अकड़न न दे

आप की बात में हौसला जो है  ये शशि नाम का पगला जो है तारीफ सुनते ही पर आजाते  इंडीब्लोगर न होता  तो ऐसे कदरदान कहा पाते  कविताये मेरी ब्लॉग मेरा  सुना था  मुझे ही लिखना था मुझे पढना था  कमेन्ट का न छुना था  कदरदान पे कदरदान  नहीं रहा मेरा ब्लॉग बियाबान  ये हौसला मेरी कलम को अकड़न न  दे  गुरुर हो जाये ऐसी सडन न दे  दिमाग भरा रहे ख्यालो से  गर्दन जुकी रहे मेरे  ख्यालो को  वजन दे  गर्दन को मेरी अकड़न न दे : शशिप्रकाश सैनी 

खाली पन्नें

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This post has been published by me as a part of the Blog-a-Ton 28 ; the 28th Edition of the online marathon of Bloggers; where we decide and we write. To be part of the next edition, visit and start following Blog-a-Ton . The topic for this month is 'BLANK PAGES'. खाली पन्नें किस्मत ने छोड़े कुछ सवाली पन्नें जिंदगी के खाली पन्नें वैसे तो मेरी कहानी से पूरी किताब भरी है लडकपन है जवानी है नादान है सयानीं है मेरी पूरी कहानी है धुंधली है सुनहरी है पूरी किताब भरी है इश्क पे रखा यकीन पर बरसीं नहीं बरसात बन के रह गया दिल का खालीपन कोई आई नहीं सौगात बन के   किस्मत ने छोड़े कुछ सवाली पन्नें दिल्लगी के खाली पन्नें रीश्ता दे फरिश्ता नहीं इंसान ही दे मोहब्बत दे भले थोड़ी नादान ही दे जिंदगी महका सकें वो खुशबू दे दिल धड़कता रहे कोई आरजू दे कब तक ख्यालों से भरे दिल्लगी के खाली पन्नें नाराज़गी दे मनाना दे ऐसा कोई तराना दे धड़कने को बहाना दे कब तक करेंगे सवाल ये सवाली पन्ने अकेलापन खटकता है दिखे ...

सोच

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photo courtesy: Nagini सोच में क्या है  इंतजार है की व्यथा है आँखों की जुबानी पढ़े  आंसुओ की कहानी पढ़े  प्रियतम से बिछड़ने का गम है या ख़ुशी है की आ रहा सनम है  सोच बहुत गहरी है  कौन जाने कहा ठहरी है  चाँद चांदनी में है सोच पूरी रोशनी में है  मन इतना गहरा है  ख़ुशी है की व्यथा है  किसको क्या पता है  सोच में क्या है :शशिप्रकाश सैनी 

मै मील का पत्थर

ऐ ज़िंदगी थोड़ा चान्स दे करने को हमे भी थोड़ा रोमांस दे  मोहब्बत  ख्यालों कविताओ से निकले  कोई दिल हम पे भी पिघले  मै चलता कोई चाल नहीं आँखों को भरमाए  मुझे में ऐसा कोई कमाल नहीं बस दिल है दिल में जज़्बात है  एक ही चाहू हज़ार नहीं मेरे यही ख्यालात है  प्यार में इसलिए पिछड़ा हू क्योकि इन दिनों  आँखों को जो भरमाए वही भाए बड़ा हू बेहतर हू  पता नहीं  पर मै मील का पत्थर हू जहाँ गडोगी वही रह जाएगा  सुन्दर है चमकदार है  जो आपकी नज़रों में हीरे है  जान लीजिए हीरे कीमत पे बिकते जो बड़ी बोली लगाएगा  साथ ले जाएगा  बाज़ार मंडियों की शान है हीरा बिकता है बिक जाएगा  हीरा पहनने में क्या मान है मै मील का पत्थर हू जहाँ गडोगी वही रह जाएगा  हीरा बिकता है बिक जाएगा  : शशिप्रकाश सैनी