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आज बरसात हुई है

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आज बरसात हुई है पकौड़ों का मौसम है दिल में अरमान ज्यादा है घर में सामान कम है दुनिया को देख हम जलते रहे उम्र भर ऐसी जलन का कोई इलाज नहीं दिल में प्यार तो है पर घर में प्याज नहीं हरी मिर्च है बहोत बेसन सौ ग्राम भी नहीं ज़िंदगी की कढ़ाही भर पाए उस तेल का इंतजाम भी नहीं लोग कहते है चाय और पकौड़ो का रिश्ता अटूट है यहाँ तो जागी हुई नींदों के सारे ख्वाब झूठ है चाय पत्तियां तो है पर दूध नहीं हमारी डिक्शनरी में काली चाय का कोई वजूद नहीं  #Sainiऊवाच

एक कहानी डरी हुई है

कागज पर सन्नाटा पसरा  कलम ठिठक कर खड़ी हुई है  एक कहानी डरी हुई है  अगले मोड़ पर नया है पन्ना  नए नए ले किरदारों से  उसको बिलकुल नया है बनना  संकोचों से भरी हुई है  एक कहानी डरी हुई है पाठक का उत्साह न डूबे  लिखने है नित नए अजूबे लिख के पीछे हट जाती है  पंक्ति पंक्ति कट जाती है  संदेहों में पड़ी हुई है  एक कहानी डरी हुई है सिक्कों की बरसात बुलाए  लेखक के बटुए तक जाए सम्मानों का ढेर लगाए  सोचे हिंदी इंगलिश गाए  उम्मीदों से दबी हुई है  एक कहानी डरी हुई है  #Sainiऊवाच

मंतर चाहे जीने वाला

मंतर चाहे जीने वाला  रात आसव को पीने वाला   भसम करे जो ढेर से ताने दर्द हमारे सीने वाला बड़ी ही काली रातें देखीं   खू को मेरे अम्ल बनाए ऐसी तो बरसातें देखी छोड़ दे मनवा रोना धोना   ऐसा मैं चाहूँ जादू ढोना अंतर तक तर तर हो जाऊँ   ऐसा कोई मंतर चाऊँ भाग्य का रोड़ा तोड़ सके जो सुख की नदियाँ मोड़ सके जो सांसें डर के पार चलाऊँ   ऐसा कोई मंतर चाऊँ ‪#‎ Sainiऊवाच‬

मैंने कविता पढ़ना छोड़ दिया है

कुछ मेरे भीतर था जिंदा  जो बचपन जैसा था एक रात ऐसा डर आया   खुद से लड़ना छोड़ दिया है   हाँ! मैंने कविता पढ़ना छोड़ दिया है सपनों की सच्चाई देखी देखा टूटें अरमानों को प्रतिभा के माथे चढ़ चढ़ कर मन का मढ़ना छोड़ दिया है   हाँ! मैंने कविता पढ़ना छोड़ दिया है छोड़ सके तो, छोड़ मैं देता   कागज कलम सिहाई को लत अपनी ये तोड़ न पाया   भाव मैं गढ़ना छोड़ न पाया पर हाँ! मैंने कविता पढ़ना छोड़ दिया है ‪#‎ Sainiऊवाच‬

फेंक दे ढेला अंतरमन में

अनमने हैं ख्वाब सारे अनमनी हैं सांसें दुनियादारी हाथ लगी है कदमों को है फासें फेंक दे ढेला अंतरमन में अब की शोर मचा दें मध्म मध्म धड़कें कितना ले ऊंची नीची सांसें रात सुबह आलिंगन होगा अब की चल दे भोर देखने बरखा फिर से गीत गा रही चल जंगल में मोर देखने मन जंगल होने दो बनते हो बाग बगीचा क्यों जल कल कल होने दो पोखर में खुद को घींचा क्यों उस ओर तो खतरा है एक अंधकार में जाने का इस ओर दिलासा है जीते जी मर जाने का ‪#‎ Sainiऊवाच‬

शोर

शोर शोर शोर शोर शोर कहीं तालियों का शोर है  कहीं थालियों का शोर शोर शोर शोर शोर शोर कहीं खुशपुसाहटों का शोर कहीं दहाड़ता है शोर ये शोर शोर शोर शोर शोर दौड़ है तो शोर है  रूक गया तो शोर शोर शोर शोर शोर शोर चीख चीख कर दुआ कहीं पार्थना का शोर आसमां ये चुप रहे  जमीन का है शोर शोर शोर शोर शोर शोर दफ्तरों का शोर है  और बरतनों का शोर कभी शोर ताल दे गई  कभी शोर बेसुरी शोर शोर शोर शोर शोर बह रहा है शोर तो बदल राह शोर वोट का है शोर  तो नोट का है शोर शोर शोर शोर शोर शोर शोर की दो आंख है  कान भी हैं दो एक मुहँ उगल रहा  है बात बात शोर शोर शोर शोर शोर शोर ‪#‎ Sainiऊवाच‬

फुल टाइम लेखक की महत्ता

मानव इतिहास में हम दो तरीको से झांक सकते हैं, एक इतिहासकार के जिरए, दूसरा लेखक के माध्यम से. दोनों ही महत्वपूर्ण हैं, इतिहासकार आपको तथ्य से रूबरू करा सकता है, जैसे कोई शरीर हो कि ये आँख है, ये कान, ये दांत वगैरह वगैरह. दूसरी तरह उस काल का लेखक उस समय के समाज की आत्मा से आपको जोड़ता है और जितना आप समाज को समझेंगे उतना ही उनके इतिहास को समझना आसान होगा. किताबें महज किताबें भर नहीं ये "टाइम मशीन" हैं, जो आपको काल यात्रा कराने में सक्षम है जैसा कि मुझे प्रेमचंद और टैगोर पढ़ कर लगता है, आपको भी लगा होगा शायद. मैं यह दावा नहीं करता कि मैं आपने वाली पीढ़ियों के लिए वर्तमान काल का बिम्ब छोड़े जा रहा हूँ, मगर कोई और तो ये बिम्ब गढ़ ही रहा होगा कविताओं से, नाटकों और कहानियों से, फ़िल्मों से. आज हम पुराने दौर की किताबें पढ़ कर उस दौर को महसूस कर पा रहें हैं, समझ पा रहें है कि समाज का विकास कैसे हुआ और जब हम समाज का विकास समझते है तब हम ये भी समझ रहे होतें हैं, कि मानव विकास कैसे हुआ (मैं यहाँ शारीरिक विकास की बात नहीं कर रहा). जब उस दौर के लेखकों ने अपनी रातें काली की तब जा कर हमे...