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Thursday, August 31, 2017

आज बरसात हुई है





आज बरसात हुई है
पकौड़ों का मौसम है
दिल में अरमान ज्यादा है
घर में सामान कम है

दुनिया को देख
हम जलते रहे उम्र भर
ऐसी जलन का
कोई इलाज नहीं
दिल में प्यार तो है
पर घर में प्याज नहीं

हरी मिर्च है बहोत
बेसन सौ ग्राम भी नहीं
ज़िंदगी की कढ़ाही भर पाए
उस तेल का इंतजाम भी नहीं

लोग कहते है
चाय और पकौड़ो का
रिश्ता अटूट है
यहाँ तो जागी हुई नींदों के
सारे ख्वाब झूठ है

चाय पत्तियां तो है
पर दूध नहीं
हमारी डिक्शनरी में
काली चाय का कोई वजूद नहीं

 #Sainiऊवाच


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Monday, December 12, 2016

एक कहानी डरी हुई है

कागज पर सन्नाटा पसरा 
कलम ठिठक कर खड़ी हुई है 
एक कहानी डरी हुई है 


अगले मोड़ पर नया है पन्ना 
नए नए ले किरदारों से 
उसको बिलकुल नया है बनना 
संकोचों से भरी हुई है 
एक कहानी डरी हुई है


पाठक का उत्साह न डूबे 
लिखने है नित नए अजूबे
लिख के पीछे हट जाती है 
पंक्ति पंक्ति कट जाती है 
संदेहों में पड़ी हुई है 
एक कहानी डरी हुई है


सिक्कों की बरसात बुलाए 
लेखक के बटुए तक जाए
सम्मानों का ढेर लगाए 
सोचे हिंदी इंगलिश गाए 
उम्मीदों से दबी हुई है 
एक कहानी डरी हुई है 


#Sainiऊवाच

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Saturday, July 9, 2016

मंतर चाहे जीने वाला


मंतर चाहे जीने वाला 
रात आसव को पीने वाला 
भसम करे जो ढेर से ताने
दर्द हमारे सीने वाला


बड़ी ही काली रातें देखीं 
खू को मेरे अम्ल बनाए
ऐसी तो बरसातें देखी
छोड़ दे मनवा रोना धोना 
ऐसा मैं चाहूँ जादू ढोना


अंतर तक तर तर हो जाऊँ 
ऐसा कोई मंतर चाऊँ
भाग्य का रोड़ा तोड़ सके जो
सुख की नदियाँ मोड़ सके जो
सांसें डर के पार चलाऊँ 
ऐसा कोई मंतर चाऊँ



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